Friday, November 14, 2008

अच्छी और बुरी यादें.

अच्छी और बुरी यादें दो नन्ही सहेलियों की तरह हैं. साथ साथ हाथों में हाथे डाले पूरा दिन इठलाती, इतराती, गाव की गलियों से, स्कूल के मैदानों से, शहर की सड़कों पर दौड़ती रहती हैं।
एक को बुलाओ तो दूजी ख़ुद बा ख़ुद दौडी चली आती है। एक से बात करो तो दूसरी से भी बतियाना पड़ता है। एक रूठती है तो दूसरी को भी मानना पड़ता है। ऐसे हालत में मन करता है दोनों को दूर कहीं बोर्डिंग स्कूल में भेज दो। कम से कम परेशान तो नही करेंगी। लेकिन हैं तो दोनों एक ही बाप की औलादें कैसे अपने कलेजे के टुकडों को बाँट दे। अच्छी और बुरी दोनों ही यादों के साथ ही रहना पड़ता है।

Tuesday, November 11, 2008

यह न पूछो

यह न पूछो कब होगा। जब होना है तब होगा। हो सकता है अब होगा, फिर न जाने कब होगा। हाथ हिलाओ तब होगा। कदम बढाओ तब होगा दिल की सुनो तब होगा। रब चाहेगा तब होगा, जो मांगोगे सब होगा। यह न पूछो कब होगा। जब होना है तब होगा। हो सकता है अब होगा, हो सकता है तब होगा, भाई जब होना है तब होगा । अब यह न पूछो कब होगा। जब होना है तब होगा।

Locker

Kal sham kisi ne jehan ke kone me rakha ek locker jo barson se band pada tha use khol diya. Saari yaden bhadbhada ke gir gayeen aur poore farsh per bikhar gayeen…aur hamesh ki tarah meri raat unhe bator kar sahej kar rakhne me beet gayee. Kuch yadon par vakt ki dhool thi to kuch par halaton ka brown cover chadha kar rakha tha. Vo bhi kinaron se phat raha tha. Kinhi par samjhauton ka cello tape laga hua tha kisi par jabardasty ka fevicol laga tha. Ek ek kar ke unhe sametane me kayeen saphe khulte gaye aur dastane phir ankho ke 70mmparde par nach uthi…Zahir hai so na saka…Magar ab locker band nahi ho rah. Achcha hai. Khula hi rahne do..

Monday, September 1, 2008

एक बार फ़िर दिल और दिमाग में जँग छिड गयी ...

दिमाग का कहना था की तुम क्या छोटी छोटी बातों में खुश रहते हो ...कुछ बड़ा सोचो..बड़ा ख्वाब देखो..बड़ी खुशियों के बारे में सोचो ...दिल ने जवाब दिया भाई यह सब काम तो तुम्हारा है मैं तो छोटी छोटी खुशियों में ही खुश रहता हूँ ..छोटी गाड़ी, छोटा परिवार, छोटी सी दुनिया मैं इन सब में खुश रहता हूँ और एक बात का जवाब दो की अगर बड़ा ख्वाब देखा और वो पूरा हो गया तो तुम बड़े खुश होगे या छोटे खुश होगे। बात साफ़ है सिर्फ़ खुश होगे। खुशी - बड़ी या छोटी नही होती उसे हम बड़ी या छोटी बनते हैं। दिमाग के पास जवाब नही था एक ही बात बोली यार कुछ भी कहो मैं कितना भी बड़ा सोंचू पर कद में तो तुम ही मुझसे बड़े रहोगे / आदमी का दिल अगर बड़ा है तो सोच अपने आप बड़ी हो जाती है।

Wednesday, May 28, 2008

उफ़ यह आर्टिस्ट बनने का कीडा...
















कुछ typography हो jaay...







कभी कभी मेरे भी दिल मे ख़याल आता है की मैं भी बड़े बड़े designers की तरह Typography करू. तो लीजिये साहब मेरी एक पेशकश।

Tuesday, August 21, 2007

एक शाम

एक शाम अपनी तनहाइयों के साथ समुन्दर किनारे बतियाते हुए बैठा था। शायद सूरज भी घर जाने कि जल्दी मे था। बातचीत के दौरान कुछ लफ्ज़ कम पड़ रहे थे। तभी लगा के लहरें अपने साथ कैन लफ़्ज़ों को लाकर रेत पर बिखरा गयी। जो लफ्ज़ कंटीले थे नुकीले थे वो रेत मे अटक गए। गोलमोल और मीठे लफ्ज़ वापस बह गए। अब हर शाम उन नुकीले कंटीले लफ़्ज़ों को चुनने मे बीट जाती है। कहीँ किसी को चुभ ना जाये इसी चिन्ता मे उन्हें ढूंद- ढूंद कर बीन रह हूँ और दूर समुन्दर मे फ़ेंक रह हूँ। फिर लॉट आते हैं कमबख्त।