अच्छी और बुरी यादें दो नन्ही सहेलियों की तरह हैं. साथ साथ हाथों में हाथे डाले पूरा दिन इठलाती, इतराती, गाव की गलियों से, स्कूल के मैदानों से, शहर की सड़कों पर दौड़ती रहती हैं।
एक को बुलाओ तो दूजी ख़ुद बा ख़ुद दौडी चली आती है। एक से बात करो तो दूसरी से भी बतियाना पड़ता है। एक रूठती है तो दूसरी को भी मानना पड़ता है। ऐसे हालत में मन करता है दोनों को दूर कहीं बोर्डिंग स्कूल में भेज दो। कम से कम परेशान तो नही करेंगी। लेकिन हैं तो दोनों एक ही बाप की औलादें कैसे अपने कलेजे के टुकडों को बाँट दे। अच्छी और बुरी दोनों ही यादों के साथ ही रहना पड़ता है।
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