Tuesday, August 21, 2007
एक शाम
एक शाम अपनी तनहाइयों के साथ समुन्दर किनारे बतियाते हुए बैठा था। शायद सूरज भी घर जाने कि जल्दी मे था। बातचीत के दौरान कुछ लफ्ज़ कम पड़ रहे थे। तभी लगा के लहरें अपने साथ कैन लफ़्ज़ों को लाकर रेत पर बिखरा गयी। जो लफ्ज़ कंटीले थे नुकीले थे वो रेत मे अटक गए। गोलमोल और मीठे लफ्ज़ वापस बह गए। अब हर शाम उन नुकीले कंटीले लफ़्ज़ों को चुनने मे बीट जाती है। कहीँ किसी को चुभ ना जाये इसी चिन्ता मे उन्हें ढूंद- ढूंद कर बीन रह हूँ और दूर समुन्दर मे फ़ेंक रह हूँ। फिर लॉट आते हैं कमबख्त।
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2 comments:
आदाब अर्ज है, भाई ब्लॉगिंग की दुनिया में आपका स्वागत है, यहाँ कुछ सोचने की जरूरत नहीं होती, बस "मन" की लिखने की आवश्यकता होती है, तो शुरु हो जाओ...आगे भी इन्तजार रहेगा...
Hi Rohit,
TOOOOOO GOOOOOOOOOD!!!!!!!
Aapaki hindika jawaab nahi
GR8! keep it up!
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